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Iran और china की बढ़ी हुई नजदीकी से भारत की बड़ी परेशानी?

जैसे कि आप सभी को पता होगा कि China और Iran के बीच एक महत्वकांक्षी डील हुई है और यह डील अब पूरी दुनिया की नजरों पर है यह एक रणनीतिक और व्यापारिक समझौता हुआ है और यह समझौता दोनों देशों के बीच अगले 25 वर्षों तक रहेगा इसी बीच इस समझौते को लेकर मंगलवार को एक खबर आएगी इरान में चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर दिया है
इसकी वजह उसने बताया कि भारत की ओर से फंड में देरी से मिलते हैं और वही आपको बता दें कि भारत और ईरान के बीच 4 साल पहले चाबहार से अफगानिस्तान सीमा पर जा जाहेदना तक रेल लाइन बिछाने को लेकर एक समझौता किया गया था और अब ईरान ने इस प्रोजेक्ट को अपने आप ही पूरा करने का फैसला कर लिया है और इस पर काम भी उसने जल्दी शुरू कर दिया।
वही ईरान और चीन के हुए 400 अरब डॉलर की डील के तहत ईरान चीन को अगले 25 वर्षों तक सस्ती दरों में कच्चा तेल देगा और इसके बदले में ईरान में चीन बड़े स्तर पर निवेश करने को तैयार है।
वही अभी कहा जा रहा है कि जब पूरी दुनिया कोविड-19 जैसी महामारी से जूझ रही है तो ईरान और चीन ने यह समझौता चुपचाप किया है।
ईरान ने यह समझौता करके चीन की पाबंदी और धमकियों को दरकिनार कर दिया है और अब इसके जो दूरगामी प्रभाव होने वाले उसके आसार भी बताए जा रहे हैं।
वही अभी बता जा रहा है कि इस समझौते का असर भारत समेत अमेरिका और बाकी देशों पर भी पड़ेगा।

क्या है यह समझौता?
वहीं ईरान की समाचार एजेंसी तस्लीम ने बताया कि यह समझौता अनुच्छेद – 6 के मुताबिक है। इस समझौते में ईरान और चीन इंफ्रास्ट्रक्चर कामा ऊर्जा कामा उद्योग और तकनीकी क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने को तैयार हैं। इसी समाचार एजेंसी ने यह भी बताया कि दोनों देश अगले 25 वर्षों के लिए आपसी सहयोग बढ़ाने को सम्मत हुए हैं वही अभिमान आ जाए तो इस डील को अभी तक ईरान की संसद मजलिस से मंजूरी तो नहीं मिली है और इसे सार्वजनिक भी अभी तक नहीं किया गया है वही लिया टाइम्स ने इस समझौते से जुड़ा हुआ 19 का दस्तावेज हासिल कर लिया है और जून 2020 की तारीख इन दस्तावेजों पर दर्ज है। और इसे तो इस समझौते का अंतिम खाका भी बताने जाने लगा है।
जब समझौते की शुरुआत में सभी को यह कहा गया कि चीन और ईरान प्राचीन एशियाई संस्कृति या कामा व्यापार कामा राजनीति, सांस्कृतिक और सुरक्षा के क्षेत्र में समान विचारों वाले ही दो सहयोगी है और यही दो सहयोगी कई साझा और दो पक्षी और वह पक्षी ही तो वाले देश को अपना रणनीतिक सहयोगी मानेंगे

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समझौते के मुताबिक इन दस्तावेजों से पता चलता है कि
ईरान के तेल और गैस उद्योग में चीन अपना 280 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
चीन ईरान को उत्पादन और परिवहन के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी $120 का निवेश देगा।
इसके बदले ईरान चीन को अगले 25 वर्षों तक नियमित रूप से सस्ते दरों में कच्चा तेल और गैस का मुहैया देगा।
वहीं चीन ईरान को 5:00 बजे तकनीकी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में मदद करेगा।
ईरान में बैंकिंग कमा टेलीकम्युनिकेशन का माप बंदरगाह कमर रेलवे और दर्जनों ईरानी परियोजनाओं में चीन अपना बड़े पैमाने पर निवेश करेगा और भागीदारी बढ़ाएगा।
चीन और ईरान दोनों देश आपसी सहयोग इसे साझा सैन्य अभ्यास और शोध करेंगे।
ईरान और चीन दोनों देश साथ में मिलकर हथियार का निर्माण करेंगे और अपनी खुफिया जानकारियां भी एक दूसरे से साझा करेंगे।

चीन और ईरान को इस डील से क्या फायदा होगा?
खाड़ी देशों में मौजूद भारतीय राजदूत और मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ अहमद का मानना है कि यह समझौता ईरान और चीन दोनों देशों के लिए बहुत मायने रखता है उनके मुताबिक ईरान चीन का सहयोगी बन रहा है और उसकी मुखालफत इजरायल अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देश करते हैं। जिस प्रकार ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर पाबंदियां लगा कर उसे जिस तरह से मैक्सिमम प्रेशर बनाया था वह ईरान इस समझौते की वजह से काफी कमजोर पड़ जाएगा
ईरान में विदेशी निवेश अमेरिकी पाबंदियों की वजह से ठप पड़ गया है ऐसे में चीन का इरान में निवेश करना कामा तकनीकी और विकास को गति मिलेगी। वहीं दूसरी तरफ देखा जाए तो कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातक देश ईरान से चीन को बेहद सस्ती दरों पर तेल और गैस भी मिलेंगे
वही माना जाए तो रक्षा के मामले में चीन की स्थिति काफी मजबूत है। और चाहे वह रक्षा उत्पादों के जरिए हो या फिर सामरिक क्षमता के लिए चीन ईरान की बहुत सी मदद कर सकता है।
ईरान चीन के लिए महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि वह उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना को बेहद ही कमियां बनाने में लाभकारी साबित हो सकता है।

क्या असर पड़ेगा भारत पर?
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और ईरान के बीच हुआ समझौता भारत के लिए एक बहुत बड़ा झटका हो सकता है।

Us and Iran

जब अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाया तो भारत ने ईरान से तेल आयात करना बंद कर दिया था वही कुछ समय पहले ईरान भारत के लिए तेल की आपूर्ति करता था।
वही जब चीन ईरान में निवेश करेगा तो उसका नुकसान भारत को भी होगा ईरान में भारत चाबहार बंदरगाह को विकसित करना चाहता है और इसे चीन द्वारा निर्मित किए गए पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का जवाब भी माना जा रहा था
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। ऐसे में ही ईरान में चीन की मौजूदगी भारती निवेश के लिए बहुत ज्यादा मुश्किलें पैदा कर सकती है।
यह डील की वजह से भारत की स्थिति अमेरिका कॉम सऊदी अरब इजरायल बनाम ईरान जैसी ही हो सकती है और यह भारत के लिए बहुत ही मुश्किल होगा
तमीज अहमद इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि आजादी से लेकर अब तक भारत की स्थिति विदेशी नीति स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की ही रही है इसका मतलब कि भारत किसी भी देश के या खेमे में शामिल नहीं होता था। और भारत कभी भी किसी के दबाव में नहीं आता था और अपने हित के अनुसार वह हर एक देश से मैं त्रिपुंड संबंध रखने की कोशिश करता था। पर कुछ पिछले कुछ वर्षों से ऐसा लग रहा है कि भारत की यह नीति कमजोर पड़ी हुई है। और भारत की इस नीति के कारण पड़ोसी देशों में यह धारणा है कि वह कहीं ना कहीं अमेरिकी प्रभाव में है।
टेल मी जामोद का कहना है कि भारत के हित रूस कमा ईरान, चीन में है और भारत के हित यूरेशिया में भी है। वही तनवीर अहमद कहते हैं कि भारत को यह साफ रूप से स्पष्ट कर देना चाहिए कि अमेरिका और रूस लड़ाई उसकी नहीं हो सकती।

China and iran

किस तरह बदल जाएंगे दुनिया के समीकरण?
ईरान और चीन का अमेरिका के प्रति नाराजगी बिल्कुल भी नहीं है। वही ईरानी मंत्रालय से संबंध संस्था इंस्टीट्यूट फॉर ट्रेड स्टडीज एंड रिसर्च ने साल 2012 में एक लेख लिखा था और इसलिए के तहत उन्होंने कहा था कि ईरान और चीन का सहयोगी होना महज स्वाभाविक ही है क्योंकि दोनों ही देश अमेरिकी और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व से नाखुश हैं। और यही नाराजगी आज इस समझौते के रूप में दुनिया के सामने आई है।
ईरानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था में से चीन की अर्थव्यवस्था है
और पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी ताकतों में से ईरान है और यही दोनों देश मिलकर बहुत जमाने वाली ताकतें यानी कि अमेरिका के दबाव को खत्म भी करेगी।
वरिष्ठ पत्रकार और ईरान मामलों के जानकार राकेश भट्ट का कहना है कि ईरान और चीन के समझौते वास्तव में यह एक अमेरिकी के लिए चुनौती बनकर सामने आएंगे। उन्होंने बीबीसी से हुए बातचीत में यह कहा कि प्रतिज्ञा टू का भंडार के पास है और ईरान के पास रूस के बाद सबसे ज्यादा नेचुरल गैस रिजल्ट है वहीं कच्चे तेल के मामले में भी ईरान सऊदी अरब के बाद ही दूसरे नंबर पर आने वाला देश है और इस समझौते के जरिए चीन सऊदी अरब के एकाधिकार वाले देश को भी चुनौती देना चाहता है और चीन ईरान को सऊदी अरब के विकल्प के तौर पर भी पेश करना चाहता है और इस पर तनवीर अहमद भी राकेश भट्ट के विचारों से सहमति जताते हुए नजर आते हैं।
अहमद कहते हैं कि चीन के प्रति अमेरिका ने ट्रेड वॉर जैसे कदमों के जरिए आक्रामक रवैया अपनाया। और अमेरिका ने चीन को ईरान से यह समझौता करने पर मजबूर कर दिया और अब दोनों ही देश मिलकर अमेरिका के सामने एक मजबूती की तरह खड़े हो गए हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसी समझौते के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों का रुख ईरान के प्रति अब थोड़ा नरम भी पड़ सकता है।
नाखुश है ईरान की जनता
वही माना जाए तो ईरान की जनता इस डील से काफी खुश नजर नहीं आ रही है। और इस समझौते को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की आशंकाएं और तरह-तरह के साथ चलाए जा रहे हैं। इन में सोशल मीडिया पर #irannotforsalenotforrent हेस्टैक के साथ इस डील को चीनी उपनिवेशवाद की शुरुआत भी बता रहे हैं
वही राकेश भट्ट का कहना है कि इस डील को लेकर ईरान के लोगों के मन में जो डर बसा हुआ है वह चीन का पिछला रिकॉर्ड की वजह से है। चीनी निवेशकों ने अपने पिछले रिकॉर्ड में अफ्रीका और एशिया के कई देशों को कर्जदार बना कर छोड़ दिया था इसी से लोगों को कुछ ऐसा लगता है कि ईरान का भी कुछ ऐसा ही होगा।

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