गोनू झा और खखनुआ हजाम

एक दिन गोनू झा प्रदेश से कई दिनों बाद आ रहे थे। वह रस्ते में एक रोहू मछली खरीदकर अपने घर ला रहे थे। जब वह अपने गाओं के करीब पहुंचे तो उन्हें अपने गाओं का खखनुआ हजाम मिला। खखनुआ गोनू झा को देख कर अपने मन में सोचने लगा की आज गोनू झा को ठग कर किसी तरह से मछली लेना चाहिए।

गोनू झा खखनुआ से पूछने लगे हमारे घर में सब कुशल है ? खखनुआ उदास भाव से जवाब दिया हां , कुशल ही है। खखनुआ के उदासी भरे जवाब से उत्सुकता पूर्वक गोनू झा फिर बोले अरे , साफ़ साफ़ बताओ क्या बात है , उदास होकर क्यों बोल रहे हो ? शीघ्र बताओ क्या बात है।

खखनुआ बोला सरकार आपके पिताजी परसो ही संसार से चल बसे।


गोनू झा उदास होकर बोले – क्यापिताजी के अंतिम दर्शन मेरे भाग्य में नहीं लिखा था। अच्छा लो ये मछली तुम ले जाओ। मुझे तो इस मछली से कुछ काम नहीं। खखनुआ मन ही मन मछली लेकर चल दिया। इधर गोनू झा जब अपने घर पहुंचा तो अपने पिताजी को दरवाजे पर बैठा देखकर मन ही मन केहने लगा अगर मै असली गोनू झा होऊंगा तो इस मछली का बदला चूका लूंगा।

उसी रात से गोनू झा कई दिनों तक दिन रात अपने चूतड़ में गुड़ा के बहाने खटिया पर ही पड़े रहे। तब एक दिन वह अपने छोटे भाई से बोले खखनुआ हजाम को बुला कर ले आओ। बहोत होशियार हजाम है। मालूम होता है गुड़ा पाक गया है। मै बहोत कष्ट में हूँ। शीघ्र चिरवा डालूंगा तुरंत ही गोनू झा के भाई ने खखनुआ हजाम से जाकर सब कैह सुनाया। हालखखनुआ भी ये सोचकर के बीमार अवस्था में गोनू झा सब बात भूल गए होंगे तुरंत ही चल पड़ा। वह आकर देखा तो गोनू झा पलंग पर पड़े है।

गोनू झा खखनुआ को देख कर तकलीफदेह स्वर में बोले मै बहोत तकलीफ में हु। खटिया के निचे जाकर हमारे चूतड़ के सामने खटिये की डोर काट दो और गुरा को सावधानी से चिड़कर मेरा कष्ट निवारण करो।

इस पर झटपट खखनुआ खटिया के निचे जाकर डोरी कटकर घाव देखने लगा। झट गोनू झा उसके मुँह पर पैखाना करते हुए बोले लो खखनुआ ये मछली ठग कर खाने का बदला है। अरे क्या तुम नहीं जानते की मेरा नाम गोनू झा है।

‘गोनू झ ठगे दिल्ली ‘ गोनू झा को ठगे घर की बिल्ली। बेचारा खखनुआ लज्जित होकर पोखर में जाकर अपना शरीर धोया और पश्चाताप करते हुए घर लौट आया। गोनू झा भी खटिये से उठकर अपना काम काज पूर्ववत करने लगे।

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